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हर-की-पौडीः

Har-Ki-Pauri:

HAR-KI-PAURI TEMPLE
HAR-KI-PAURI TEMPLE

हर की पौडी हरिद्धार में स्थित है जो यहाँ का सबसे प्रमुख तथा विश्व प्रसिद्ध मदिर है। हर की पौडी दो शब्दो से मिलकर बना है हरि पौडी। हरि का अर्थ भगवान नारायण से है तथा पौडी का अर्थ सीढी से है। अर्थात भगवान नारायण के पास जाने का रास्ता।

यह तीर्थ नगरी हरिद्धार में स्थित है जो दो अक्षरो हरि और द्धार से मिलकर बना है। जिसका अर्थ होता है भगवान हरि के पास पहुचने का रास्ता। यहाँ पर भगवान हरि के पैरो के निशान भी एक पत्थर पर बने हुए है। इस स्थान का निर्माण राजा विक्रमादित्य द्वारा अपने भाई ब्रिथारी की याद में कराया गया था

चार धामो हेतु जाने वाले यात्री पहले हरिद्धार की हर की पौडी में स्नान करके ही आगे के लिए जाते है तथा यहाँ से गंगा का जल भरकर ले जाते है। यहाँ एक पवित्र कुण्ड है जिसे ब्रहमकुण्ड कहकर पुकार जाता है, कहा जाता है कि यहाँ स्नान से मनुष्य जीवन मुत्यु के चक्र से छूट जाता है।

मान्यता के अनुसार जब देवता और दानव समुद्र में मंथन कर रहे थे तब मन्थन के दौरान समुद्र से घडे में अमृत निकला था तब देवताओ के ईशारे पर देवराज इन्द्र के पुत्र विश्वकर्मा जी वो घडा लेकर भाग निकले थे, भागते हुए उस घडे से अमृत की कुछ बूंदे पृथ्वी पर गिर गई थी, उन बूंदो में से कुछ बूंदे हर की पौडी स्थित ब्रहमकुण्ड में गिरी थी तभी से इस जगह की मान्यता है। मान्यता के अनुसार यहाँ पर नहाने से मनुष्यो के सारे पाप धुल जाते हैं।

यही वो स्थान है जहाँ से गंगा नदी पहाडों का छोडकर मैदानी ईलाकों में बहना शुरू करती है। यहाँ पर कई अन्य धाट और भी है जहाँ भीड बढने पर लोग उन्ही घाटों पर स्नान किया करते है।

HAR-KI-PAURI TEMPLE
HAR-KI-PAURI TEMPLE

कुम्भ, अर्धकुम्भ, बैसाखी, मकर संक्रान्ति, अमावस्या अन्य बडे स्नानों के दौरान बड़ी मात्रा में श्रद्धालु स्नान हेतु आते है जिस कारण यहाँ पर बडी संख्या में पुलिस बल तैनात किया जाता है। शाम के समय यहाँ प्रतिदिन आरती का आयोजन किया जाता है जिसे देखना अपने आप में ही अदभुत होता है, उस समय पूरी गंगा नदी रंगीन लाईटों की रोशनी से रंगीन हो जाती है, जिसे देखने दूरदूर से श्रद्धालु गंगा आरती गंगा दर्शन हेतु यहाँ आते है।

हर की पौडी के पास में ही कुशावर्त घाट स्थित है जहाँ श्राद्धों के समय पर अपने पूर्वजो का श्राद्ध तर्पण करने वालो का तांता लगा रहता है जहाँ लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति हेतु बडी संख्या में दान आदि करके पुण्य कमाते है। यहाँ पर अत्यधिक भीड को देखते हुए यहाँ की सरकार द्वारा हर की पौडी से मंसा देवी तक रोपवे चलाने हेतु विचार किया जा रहा है।

ताडकेश्वर महादेवः

Tarkeshwar Temple

TEDKESHWAR MAHADEV MANDIR
TEDKESHWAR MAHADEV MANDIR

ताडकेश्वर मन्दिर जिला पौडी के लैंसडाउन में स्थित है जो देवदार बलूत के पेडो धने जंगलो से ढका हुआ है। यह मन्दिर भगवान शिव को अर्पित है। यह समुद्र तल से 2092 मीटर की ऊॅचाई पर स्थित है तथा 5 किमी की चौड़ाई में स्थित है।

ताडकेश्वर मन्दिर की गिनती प्रसिद्ध सिद्ध पीठों तथा तीर्थ स्थलों में से होती है। यह स्थल भगवान शिव की विश्राम स्थली के नाम से भी जानी जाती है। यह स्थान प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है जहाँ पानी के कई झरने भी निकलते है।

पुराणो के अनुसार ताडकेश्वर धाम से ही विषगंगा मधु गंगा नामक नदिया निकलती है। यहाँ 1 वर्ष के अन्दर चार बार पूजा होती है जहाँ श्रद्धालु हजारों की संख्या मे पूजा करने हेतु आते है। गांव में फसलों के होने पर पहली फसल अथवा भेंट यही पर चढाई जाती है उसके उपरान्त उस फसल का इस्तेमाल घरो मे किया जाता है।

महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। मान्यता के अनुसार यहाँ पर मांगी गई सारी मन्नतें जरूर पूरी होती है। यहाँ एक कुण्ड भी है जिसे माता लक्ष्मी द्वारा स्वयं खोदा गया था। इसी जल का प्रयोग शिवलिंग में चढाने हेतु भी किया जाता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार राक्षसराज ताडकेश्वर द्वारा भगवान शिव की आराधना कर शिव जी से अमरता का वरदान प्राप्त कर लिया था तथा पूरे संसार में गलत कार्य कर साधुओ संतो को परेशान कर उनको मारने लगा था। इसे देखते हुए संतो ने भगवान शिव से उन्हे बचाने की आराधना की, जिस कारण भगवान शिव द्धारा मां पार्वती से विवाह किया, फलस्वरूप उनसे एक पुत्र हुआ जिसका नाम कार्तिक पडा। कार्तिक और ताडकेश्वर में युद्व चल रहा था, अपने को मरता देख ताडकेश्वर भगवान शिव से क्षमा मांगने लगा।

तब भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया कि कलयुग मे लोग तुम शिव के नाम से ही पूजे जाओगे। तब से इस स्थान का नाम ताडकेश्वर महादेव पडा। पहले इस मंदिर में एक शिवलिंग था परन्तु बाद में इसे हटाकर इसकी जगह शिव जी की मूर्ति रख दी गई।

एक अन्य मान्यतानुसार जब भगवान शिव ताडकासुर का वध करने के बाद विश्राम हेतु इसी जगह पर रूके थे। आराम के दौरान शिव जी के मुहॅ पर धूप पडने लगी, तब माता पार्वती उनको घूप से बचाने हेतु वहाँ पर सात देवदार के पेड लगाए थे। यहाँ आने हेतु लोग अपने वाहनों द्वारा मन्दिर तक सकते हैं परन्तु अन्य लोगों को यहाँ तक आने के लिए 5 किमी की दूरी तय करनी पडती हैं।

बागनाथ मन्दिरः

Baghnath Temple:

BAGHNATH TEMPLE
BAGHNATH TEMPLE

बागनाथ मन्दिर जिला बागेश्वर मे तथा समुद्र तल से 1004 मीटर की ऊॅचाई पर स्थित है। ये यहाँ के सबसें चर्चित, महत्तवपूर्ण प्राचीन शिव मंदिरों में से एक है। यह मन्दिर सरयू गोमती नदी के तट पर बसा हुआ है तथा इसी मन्दिर के नाम पर ही इस शहर का नाम बागेश्वर रखा गया।

यह हिन्दू धर्म को मानने वालो के लिए भी एक प्रसिद्ध स्थल है। इस स्थल को मार्केंडेय ऋषि की तपोभूमि भी कहा जाता है।

मान्यता के अनुसार मार्केंडेय ऋषि को आशीर्वाद देने हेतु भगवान शिव बाघ के रूप में यहाँ आये थे तभी से इस शहर का नाम बागेश्वर पडा। भगवान शिव यहाँ पर बाध के रूप में निवास करते थे इसलिए इसे व्याघेष्वर के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ सावन के प्रति सोमवार को लोग भगवान शिव की प्रार्थना के लिए यहाँ आते है। इसका निर्माण सन 1602 में चन्द्रवंशी राजा लक्ष्मी चन्द्र ने करवाया था।

7वी सदी से 16 वी सदी तक मन्दिर के अन्दर रखी प्रतिमायें आज भी मन्दिर के अन्दर रखी हुई है जिसमे सें उमामहेश्वर, पार्वती, महिषासुरमर्दिनी, एकमुखी चतुर्मुखी शिवलिंग, गणेश, विष्णु, सूर्य की मूर्तिया है जो यह सिद्ध करती है कि यहाँ सातवी सदी के आसपास यहाँ भव्य मंदिर रहा होगा।

मकर संक्रान्ति के दिन यहाँ उतरायणी का प्रसिद्ध मेला लगता है जो बागेश्वर के साथसाथ पूरे उत्तराखण्ड का सबसे प्रसिद्ध मेला है। इस मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्री की पूजा होती है साथ में चंदन, बछडे, खीर, खिचडी आदि का भोग लगता है।

इस मंदिर के पुजारी रावल जाति के होते है। पहले यहाँ चैरासी के पांडे लोग अनुष्ठान आदि किया गया थे परन्तु बाद में उन्होने ये काम चैरासी के ही जोशी लोगो को सौप दिया था। अब यहाँ जोशी लोग ही धार्मिक अनुष्ठान आदि किया करते है।

इस मंदिर की दूरी राजधानी देहरादून से 470 किमी तथा नई दिल्ली से लगभग 502 कि0मी0 की है। यहाँ से निकटतम रेलवे स्टेशन काठगोदाम है वहाँ से यहाँ तक बस या टैक्सी द्वारा आया जा सकता है।

चितई गोलू देवता मन्दिरः

Chitai Golu Devta Tempel:

CHITAL GOLU TEMPLE
CHITAL GOLU TEMPLE

चितई गोलू देवता का मन्दिर उत्तराखण्ड के अल्मोडा जिले में स्थित है। यह चारो और से जंगलो पहाडो से घिरा हुआ है। इसकी मान्यता देश ही नही अपितु विदेशों तक मे है।

यह बिन्सर वन्य जीव अभ्यारण्य के मुख्य द्धार से 2 किमी की दूरी पर स्थित है। गोलू देवता को न्याय का देवता अथवा न्याय का प्रतीक माना जाता है। जिन व्यक्तियों को न्याय मिल रहा हो या जिन व्यक्तियों के साथ अन्याय हुआ हो, गोलू देवता इन्हे तुरन्त न्याय दिलाते है।

गोलू देवता को शिव के अवतार के रूप मे पूजा जाता है। गोलू देवता को सफेद पगडी, सफेद कपडो, सफेद शाल के साथ पेश किया जाता है। यहाँ मौखिक रूप से, कागज में तथा स्टाम्प पेपर में लिखकर अर्जीया मन्दिर की दीवारों पर चिपकाई जाती है। इन्ही के द्वारा श्रद्धालु भगवान से अपनी मन्नतें मांगते है तथा अपनी मन्नतें पूरी होने पर इस मन्दिर में घंटिया चढाते है।

यहाँ आपको हर साईज की घंटिया देखने को मिल जायेगी। यह मन्दिर चारों और से घंटियों से भरा हुआ है जहाँ भी देखो आपको सिर्फ घंटिया ही दिखाई देती है इसलिए इसे घंटियों वाला मन्दिर अथवा अर्जियों वाला मन्दिर कहकर भी पुकारा जाता है। यहाँ पर इतनी घंटिया है जितनी विश्व के किसी भी मन्दिर में नही है।

यहाँ की घंटिया तो बेची जाती है और ही किसी और इस्तेमाल में आती है यहाँ घंटिया संभाल के अन्दर रख दी जाती है जिससे और घंटियों को बांधने की जगह हो सके।

गोलू देवता को कुमाऊँ क्षेत्र के कई गावों में ईष्ट देवता के रूप में पूजा जाता है। गोलू देवता अथवा गोलज्यू देवता का एक प्रसिद्ध मन्दिर चम्पावत, गैराड, धोडाखाल अथवा बिन्सर में भी स्थित है जिसकी इस मन्दिर के समान ही मान्यता है।

जागेश्वर धामः

Jageshwar Dham temple:

JAGESHWAR TEMPLE
JAGESHWAR TEMPLE

उत्तराखण्ड के प्रसिद्व मन्दिरों में से जागेश्वर धाम एक प्रसिद्ध मंदिर है जो अल्मोडा से 35 किमी की दूरी पर स्थित है। यह स्थान अपने सौन्दर्य के लिए विश्व भर में स्थित है। यह भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है। यहाँ आकर व्यक्तिओं को आद्यात्मिक शान्ति की प्राप्त होती है। इस परिसर के अन्दर लगभग 150 मंदिर है जिसमे एक ही स्थान पर 124 छोटेबडे मन्दिर है। यह स्थान समुद्रतल से लगभग 6200 फुट की ऊॅचाई पर तथा पवित्र जटागंगा नदी के तट पर स्थित है।

यह स्थान प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण है। यह स्थान चारों और से देवदार के पेडो से ढका हुआ है। उस मन्दिर का निर्माण बडीबडी पत्थर की शिलाओं को काटकर किया गया है जिसके दरवाजें पर देवी देवताओं के चित्र बडेबडे चित्र बने हुए है। यह मंदिर दक्षिण भारतीय, नेपाली तिब्बती मंदिरों की बनावट जैसे दिखाई देता है। जागेश्वर धाम भगवान विष्णु द्वारा स्थापित 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है।

यह स्थल भगवान शिव, भगवान विष्णु, मां दुर्गा को समर्पित है, जहाँ देश भर से श्रद्धालु यहाँ अपनी इच्छा पूर्ति हेतु आते है। इसके अन्दर दांडेश्वर मंदिर, चंडी का मंदिर, कुबेर का मंदिर, जागेश्वर मंदिर, हनुमान मदिर, मृत्युंजय मंदिर, नवगृह मंदिर, पिरामिण मंदिर, सूर्य मंदिर, नंदादेवी मंदिर आदि प्रमुख मंदिर है।

इस मंदिर के विषय मे अभी कोई साक्ष्य नही मिला कि इसका निर्माण कब हुआ है फिर भी मान्यता के अनुसार ये मंदिर 7 वीं से 12 वीं शताब्दी के बीच का रहा होगा तथा कत्यूरी चंद्र राजवंश के दौरान इनका निर्माण हुआ होगा। मान्यता के अनुसार आदि गुरू शंकराचार्य ने भी यहाँ के कुछ मंदिरो का निर्माण कुछ का पुनःनिर्माण भी करवाया था।

यहाँ का मृत्युंज्य मंदिर सबसे पुराना दंडेश्वर मंदिर सबसे बडा मंदिर है। सावन के माह में विशेषकर सोमवार को बडी संख्या में देश विदेश से श्रद्धालु यहाँ पूजा महामृत्युंज्य जप आदि करने के लिए यहाँ आते है।

पुराणो के अनुसार इस मंदिर में मांगी मन्नते उसी रूप में स्वीकार हो जाया करती थी जैसा मन्नत मांगने वाला चाहता था इससें कई लोगो का अहित भी होने लगा था, तब शंकराचार्य ने अपनी शक्ति से इस स्थान को कीलित कर दिया था तब से दूसरो के लिए बुरी कामना मांगने वालो की मनोकामनाएं पूरी नही होती है अपितु यज्ञ और अनुष्ठान द्वारा केवल मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी होती है।

पाताल भुवनेश्वर मन्दिरः

Patal Bhuvneshwar Temple:

PATAL BHUVNESHWAR TEMPLE
PATAL BHUVNESHWAR TEMPLE

पाताल भुवनेश्वर मन्दिर उत्तराखण्ड का एक प्रसिद्ध मन्दिर है जो उत्तराखण्ड के पिथौरागढ जिले मे स्थित है तथा वहाँ के सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट में स्थित है। यह गंगोलीहाट से 14 किमी की दूरी पर बसा हुआ एक प्रसिद्ध तीर्थ है जहाँ एक गुफा के अन्दर भगवान शिव के साथ 33 कोटि देवी देवता निवास करते है। यह गुफा भक्तों के आकर्षण का केन्द्र है जो धने जंगलो के बीच मे बसा हुआ है।

यह धार्मिक दृष्टि सांस्कृतिक दृष्टि से हिन्दुओं के लिए एक प्रमुख स्थान है। बाहर से देखने पर यह एक साधारण जगह प्रतीत होती है यहाँ बाहर अन्दर जाने के लिए एक छोटा सा दरवाजा है परन्तु अन्दर जाने पर एक बडी सी गुफा है जो पृथ्वी के 90 फीट अन्दर है तथा 160 वर्ग मीटर क्षेत्र मे फैली हुई है।

इस गुफा के अन्दर चार पत्थर रखे हुए है जो चारों युगो के प्रतीक माने जाते है जिसमे से एक पत्थर कलयुग का प्रतीक माना जाता है कहा जाता है कि जब ये पत्थर दीवार से टकरा जायेगा तब पृथ्वी का अन्त हो जायेगा। इस गुफा के अन्दर बद्रीनाथ, केदारनाथ अमरनाथ जी के भी दर्शन होते है। यहाँ कालभैरव की जीभ के दर्शन भी होते है मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति कालभैरव के मुह से गर्भ मे प्रवेश करके पूँछ तक पहुच जाता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस गुफा की खोज सबसे पहले सूर्य वंश के राजा ऋतुपर्णा ने की थी, जो त्रेता युग मे अयोध्या के शासक थे। पुराणो के अनुसार जब राजा ऋतुपर्णा एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में प्रवेश किया तो उन्होने भगवान शिव 33 कोटि देवी देवताओं के साक्षात दर्शन किये थे। द्धापर युग में पाण्डवों ने इसी स्थान पर चौपड़ खेला था। मान्यता के अनुसार भगवान शिव स्वयं इस स्थान पर रहते है और अन्य देवी देवता उनकी पूजा आराधना करने हेतु यहाँ आते है।

मान्यता के अनुसार सन 822 मे गुरू शकराचार्य जी यहाँ आये थे तथा मन्दिर में तांबे का शिवलिंग स्थापित किया था। इस गुफा मे जाना बहुत कठिन है इसलिए अन्दर जाने के मोटी जंजीर लगी हुई है। जंजीर के सहारे ही व्यक्ति गुफा के अन्दर पहुँच सकता है। लगातार दीवारो से पानी रिस्ने के कारण गुफा की दीवारें बहुत चिकनी हो चुकी है।

इस गुफा की दिवारो पर कई देवीदेवताओं के चित्र उकेरे हुए है जो इस गुफा की पवित्रता को बयां करता है। इस गुफा के अन्दर 1000 पैरो वाला हाथी बना हुआ है साथ में शिवजी ने गजानन का जो सिर काटा था वो भी इसी गुफा के अन्दर रखा हुआ है।

इसके अन्दर हंस के जोडे भी बने हुए है जो मान्यता के अनुसार भगवान ब्रहमा जी के है। इसके अन्दर एक कुण्ड भी बना हुआ है जिसमें मान्यता के अनुसार जनमेजय ने नागयज्ञ किया था जिसमे सारे साँप जलकर भष्म हो गयें थे।

चण्डी देवी मन्दिरः

Chandi Devi Temple:

CHANDI DEVI TEMPLE
CHANDI DEVI TEMPLE

हरिद्धार को मंदिरों का शहर कहा जाता है। यहाँ दर्शन करने हेतु देश विदेश से लोग पूरे साल भर यहाँ आते है। हरिद्धार शहर दो शब्दों से मिलकर बना है। हरि और द्वार अर्थात भगवान की और जाने का रास्ता। यही से ही श्रद्धालु आगे चार धाम दर्शन हेतु जाते है। हरिद्वार में कई प्राचीन और सिद्ध मन्दिर है। इन्ही सिद्ध प्राचीन मन्दिरों मे से एक मां चण्डी देवी का मन्दिर है जो विश्व के सबसे प्राचीन मन्दिरों में से एक है और मां चण्डी को अर्पित है।

मां चण्डी और मां मन्सा माता पार्वती के ही दो स्वरूप है। ये मन्दिर हर की पौडी के ठीक सामने की पहाडी पर स्थित है। यह भारतवर्ष के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है तथा देश के 52 शक्तिपीठो में से एक है। इस मन्दिर का निर्माण कश्मीर के राजा सुचात सिंह ने 1929 में करवाया था परन्तु इसके अन्दर रखी मुर्ति की स्थापना 8 वी सदी में गुरू शंकराचार्य जी द्वारा करवायी गई थी। यह मन्दिर नील पर्वत पर स्थित है।

ये मन्दिर हरिद्धार के तीन तीर्थो मे से भी एक है जिसमे एक चण्डी देवी, दूसरी मन्सा देवी तीसरा माया देवी है। चण्डी देवी को मां चंडिका के रूप में भी जाना जाता है जो यहाँ की प्रमुख देवी है जो यहाँ पर माता खंभ के रूप में विराजमान है। चण्डी देवी के निकट एक अंजना माता का भी मन्दिर है जों हनुमान जी की माता कही जाती है। कहा जाता है कि इस मन्दिर में जाने वाले व्यक्तियों को इस मन्दिर में अवश्य जाना चाहिये।

मन्दिर जाने हेतु पैदल मार्ग उडनखटोला मार्ग दोनों उपलब्ध हैं। पैदल मार्ग जाने हेतु रास्ता थोडा लम्बा खडी चढाई वाला है परन्तु उडनखटोला द्वारा मात्र कुछ ही मिनटों में ऊपर मन्दिर तक पहुचा जा सकता है। ऊपर से आपको हरकीपौडी, चण्डीदेवी अन्य के साथ सम्पूर्ण हरिद्धार के भी दर्शन होते है।

पौराणों के अनुसार दानवो मे से शुंभ, निशुंभ ने देवताओं पर आतंक मचा रखा था। दानवों नें देवराज इन्द्र को प्रताडित कर उन्हे उनके राज्य से बाहर कर दिया था और देवताओं को स्वर्ग से बाहर कर दिया था।

देवताओं द्वारा उनके संहार करने का प्रयास किया गया परन्तु तब वो असफल हो गये तब उन्होने मां पार्वती से प्रार्थना की। तब मां पार्वती द्वारा चण्डी का रूप धारण कर उन देवताओं के सामने प्रकट हुई। उस देवी रूपी महिला की सुन्दरता देखकर शुंभ उनकी तरफ आकर्षित होकर उनके सम्मुख शादी का प्रस्ताव रखा परन्तु देवी द्वारा इन्कार किये जाने पर शुंभ ने अपने राक्षसों चंड और मुंड को उन्हे मारने के लिए भेजा परन्तु वो दोनो युद्ध में देवी चामुंडा द्धारा मारे गये।

उन्हे मारने के उपरान्त देवी चामुंडा द्वारा शुंभ और निशुंभ को भी मार गिराया तथा देवताओं से वर मांगने को कहा। देवताओ ने वर में उन्हे इसी स्थान पर विराजमान होने की प्रार्थना की। देवताओं की प्रार्थना मान कर देवी इसी स्थान पर विराजमान हो गई। तब से ही देवी चण्डी के रूप में इस स्थान से ही भक्तों के ऊपर कल्याण करती रही है तथा उन कि हर मनोकामना पूरी करती है।

चण्डी चैदस नौरात्रियों के समय पर यहाँ हजारों की संख्या में श्रद्वालु आते है तथा अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए प्रार्थना करते है उनकी मनोकामना पूरी भी होती है। यहाँ के दर्शन मात्र से अकाल मृत्यु, रोग नाश, कष्टो से मुक्ति, शत्रु, भय आदि से मुक्ति मिलती है।

यहाँ से हरिद्वार बस अडडा रेलवे स्टेशन लगभग 3 किमी की दूरी पर स्थित है जहाँ से आटो रिक्शा या प्राईवेट वाहन द्वारा आसानी से यहाँ पहुचा जा सकता है।

मन्सा देवी मन्दिरः

Mansa Devi Temple:

MANSA DEVI TEMPLE
MANSA DEVI TEMPLE

यह मन्दिर हरिद्वार में स्थित है और जहाँ के तीन तीर्थो में इसकी गिनती है। यह मन्दिर भारत के सबसें पुराने मन्दिरों में से एक है।

मां मनसा के जन्म का लेकर कई कहानीया बतायी जाती है। कई धार्मिक पुस्तको में इन्हे भगवान शिव की पुत्री बताया गया है जिनकी उत्पत्ति भगवान शिव के मस्तक से हुई है इस कारण इनका नाम मनसा मां पडा। इन्हे नागराज वासुकी की मां के रूप में भी पूजा जाता है। इनका वास्तविक नाम जरत्कारू है। इनके पति का नाम भी मुनि जरत्कारू तथा पुत्र का नाम आस्तिक है, परन्तु कुछ धर्मिक पुस्तकों में इनका जन्म मुनि कश्यप के मस्तक से होना भी बताया गया है।

कुछ ग्रन्थों में वासुकी नाग द्वारा बहन की इच्छा प्रकट करने पर शिव द्धारा उस कन्या को भेट करने की कहानी भी बनाई जाती है परन्तु उस कन्या के तेज का सह पाने के कारण वासुकी द्धारा इस कन्या को नागलोक में तपस्वी हलाहल को दे दिया गया था। बाद मे इसी कन्या को बचाने के लिए हलाहल ने अपने प्राण त्याग दिये थे।

मां मनसा को विष की देवी के रूप में भी माना जाता है। विष की देवी के रूप में इन्हे बंगाल में पूजा जाता है। इनके सात नामों को लेने से सर्प का भय नही रहता है जो जरत्कारू, जगतगौरी, मनसा, सियोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जगतकारूप्रिया, आस्तिकमाता और विषहरी है।

मां मनसा का मन्दिर बिल्व पहाडी पर स्थित है। मां मनसा का अर्थ अभिलाशा से होता है जिसका अर्थ मनोकामना पूर्ण करने वाली होती है। मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति मां मनसा की पूजा अपने पूरी श्रद्धा से करता है मां उसकी सारी मुरादें पूरी करती है। इन्हे 14 वीं सदी के बाद शिव के परिवार के रूप में मन्दिरों में पूजा जाने लगा। यह माता के 52 शक्तिपीठों में से एक है। इन्हे नागमाता के रूप में भी जाना जाता है। महाभारत के युद्ध में भी राजा युधिश्ठिर ने मां मनसा की पूजा की थी जिसके परिणामस्वरूप उन्हे युद्ध में विजय प्राप्त हुई थी।

उनके मंत्र ऊॅ हु मनसा अमुक हु फट का सवा लाख बार जप करने से मनुष्य की हर मनोकामना पूरी होती है। मनसा देवी मन्दिर के अन्दर माता की दो मूर्तिया रखी हुई है जिसमें एक मूर्ति की पाँच भुजाए तीन मुंह है तथा दूसरी मूर्ति की आठ भुजाए है। इस मन्दिर के अन्दर एक बडा से पेड लगा हुआ है जहाँ पर अपनी मनोकामना मांगने पर धागा बांधना होता है तथा वो मनोकामना पूरी होने पर वो धागा खोलना जरूरी होता है। किसी के ऊपर यदि किसी भी प्रकार का राशि दोष या कालसर्प दोष हो तो इस मन्दिर में पूजा करने से हर प्रकार के दोष समाप्त हो जाते है।

मनसा देवी की पूजा के बाद ही नागो की पूजा की जाती है। यहाँ के तीन प्रसिद्ध तीर्थ मनसा देवी, चण्डी देवी माया देवी त्रिभुज आकार में बने हुए है। यहाँ पहुचने का रास्ता बहुत ही आसान है। बस अडडे या रेलवे स्टेशन पहुचने पर आप टैक्सी, तांगा, पैदल रिक्शा या आटो रिक्शा द्वारा मन्दिर तक पहुचा जा सकता है। ये स्टेशन से लगभग 2 किमी की दूरी पर बसा हुआ है।

वहाँ पहुचने पर आप पैदल या उडनखटोला द्वारा ऊपर मन्दिर तक पहुँच सकते है। पैदल चलने पर आपको कुछ समय लग सकता है परन्तु उडनखटोला द्धारा आप कुछ ही समय में मन्दिर में पहुँच सकते है।

मायादेवी मन्दिरः

Mayadevi Temple:

MAYADEVI TEMPLE

माया देवी मन्दिर हरिद्धार में स्थित है जो यहाँ के प्रसिद्ध तीर्थो में से एक है। यह भारत मे देवी मां के 52 शक्तिपीठों में से एक तथा हरिद्धार के तीन शक्ति पीठो में से एक है। यह मन्दिर हरिद्धार के प्रमुख मन्दिरों में सें एक है। माना जाता है कि से मन्दिर देवी सती या शक्ति द्वारा पवित्र किया गया है। माया देवी मन्दिर देवी माया को समर्पित है। माया देवी मन्दिर भारत के प्राचीन मन्दिरों मे से एक है। माया देवी मन्दिर 11 वीं शताब्दी से पूर्व का है।

यहाँ आकर आराधना करने से शक्ति का अहसास होता है। हरिद्धार को पहले मायापुरी भी कहा जाता था जो मायादेवी के नाम पर ही रखा गया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री उमा का विवाह भगवान शिव से हुआ था। राजा दक्ष भगवान शिव को पसन्द नही करते थे।

एक बार राजा दक्ष ने कनखल स्थित दक्ष प्रजापति में हवन का आयोजन किया जिसमें उन्होने भगवान शिव को छोडकर अन्य देवी देवताओं को बुला लिया। ये सुनकर भगवान शिव बहुत क्रोधित हुए परन्तु अपनी पत्नी देवी उमा के जिद करने पर वो वहाँ जाने के लिए तैयार हो गये।

वहाँ पर राजा दक्ष द्वारा सभी देवो का सम्मान किया गया परन्तु भगवान शिव का अपमान किया गया। यह देख माता उमा को बहुत दुख हुआ। वो यह कहकर हवन कुण्ड में कूद गई कि अगले जन्म में भी मे भगवान शिव की ही पत्नी बनूंगी और आपका यह हवन कभी सफल नही होने दूंगी, यह कहते हुए वो हवनकुंड में कूद गयी तथा सती हो गयी।

यह देखकर भगवान शिव ने अपने गणों के साथ राजा दक्ष के हवन कुण्ड को तोड डाला तथा क्रोधित हो कर माता सती के मृत शरीर को लेकर आकाश मार्ग में भ्रमण करने लगे। इस प्रकार भगवान शिव को देखकर सभी देवगढ सोचने लगते है कि भगवान शिव कही पृथ्वी को नष्ट कर दे तो सभी देवगढ भगवान शिव से प्रार्थना कर उनके क्रोध को शान्त कर देते है।

उसके बाद भगवान शिव माता सती के मृत जले हुए शरीर को लेकर आकाश मे घूमने लगते है, जिसजिस स्थान में देवी सती के शरीर के टुकडे गिरते है वही शक्ति पीठ स्थापित होते गये। इस स्थान पर मां सती का दिल नाभि गिरे थे। बाद में इस स्थान पर एक भव्य मंदिर बनाया गया था। मायादेवी मन्दिर के अन्दर मूर्ति के चार भुजा तीन मुँह है। माया देवी की मूर्ति के बायें हाथ पर देवी काली दाये हाथ पर देवी कामाख्या की मूर्ति बनी हुई है। माया देवी मन्दिर के पास ही भैरव बाबा का मन्दिर भी है। मान्यता के अनुसार जब तक श्रद्धालु भैरव बाबा के दर्शन कर ले उनकी पूजा पूरी नही होती है। यहाँ दर्शन करने हेतु हरिद्धार से ही नही अपितु देश विदेश से लोग यहाँ आते है और अपनी मुराद मांगते है और मां उनकी सारी मुरादे पूरी भी करती है।

श्रद्धालु माया देवी मां को प्रसाद के रूप में नारियल, फल, फूल, अगरबत्ती तथा मां की चुनरी आदि चढाते है। नवरात्रियों के समय यहाँ पर अत्यधिक भीड होती है। मायादेवी, मन्सादेवी और चण्डीदेवी आपस में एक त्रिभुज के आकार की आकृति बनाते है।

मायादेवी मन्दिर हेतु पहुचने के लिए श्रद्धालुओं को पहले बस अडडा या रेलवे स्टेशन पहुँचना होता है वहा से आटो रिक्शा, तांगा टैक्सी द्वारा यहा पहुँचा जा सकता है। स्टेशन से यहाँ की दूरी लगभग 2 किमी की है जो हर की पौडी के बिल्कुल नजदीक है।